हर शाम अपने साथ इतनी बेचैनी क्यूँ लाती है?
सुबह का इंतज़ार मुझसे ज्यादा कीसे होगा
कदम उठ भी रहे हैं, चलने का अहसास भी है
पर मैं अपनी जगह पर जड़ हूँ, ये आभास भी है
हर रात से हाथ जोड़कर प्रार्थना करके देखा है
पर सुबह की धुंध है की कम होती नहीं
एक सुबह वो होगी जब फूल मुस्कुराएंगे
इसलिए नहीं क्युंकी उन्हें मुस्कुराना चाहीये
बल्कि इसलिए क्यूंकि वो चाहते हैं मुस्कुराना
उस सुबह सुरक चमकेगा ऐसे सब कुछ भस्म कर दे जैसे
पर उससे पिछली रात
और बहुत सी पीछ्ली रातें
नम होंगी
कुछ भीगी और कुछ सीली होंगी
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